Wednesday, 17 August 2016

सुनो तुम्हारे भीतर कुछ रेंग रहा है


मेरे पास दुख हैं. जिसमें से एक दुख ये- 
 तुम ने जिन लोगों की कतार में मुझे खड़ा कर दिया, उस कतार के लोगों ने बहुत कुछ चाहा बस तुम्हें नहीं चाहा. वे बीच के लोग थे. तुम चाहती तो न भी इस्तेमाल करती इतने ठहरे हुए शब्दों से गुंथे वाक्य. लेकिन तुमने चाहा नहीं.  तुम बीच में नहीं हो, मैं खुश हूं अपने हिस्से का, कई मुलाकातों में पहाड़ सा समझाया गया मुझे मेरा ये हिस्सा..मैं लिखना भी नहीं चाहता कि तुम ढूंढो खुद को मेरे लिखे में.. इसे कुछ आखिरी सा समझा जाए.. क्या तुम में इतनी हिम्मत बची है कि तुम पढ़ सको सुंदर दिनों के खत.

ये मौसम के खिलाफ है कि मैं रहूं तुम्हारे पास सिर्फ सर्दियों में 
ये ईश्वर के खिलाफ है कि तुम चाहों मुझे सिर्फ अपने सुखों में 
ये गणतीय नियमों के खिलाफ है, कि तुम शून्य लिए लौटना चाहो शून्य की ओर

ये भाषा के खिलाफ है कि तुम चाहो रहना मौन
क्या बुद्ध का मौन रहना उस भाषा के खिलाफ नहीं है जिससे हमने चुना था प्रेम शब्द


लड़की के भीतर रेंगता रहा है एक दूसरा आदमी. 

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